Sahitya

बापू मुझे पढ़ने दो

WRITTEN BY ANURAG VERMA

कमरे में बैठे बापू , मेहमानो से बतिया रहे

माँ यहाँ रसोई में , सारे पकवान बना रही

 

न जाने क्यों, मुझे साड़ी पहना खूब सजाया जाता है

धीरे से आवाज़ लगा, भाई मुझे बुलाता है

दीदी , मुझे मेहमानों के पास ले जाती है

फिर घूँघट हटा , मेरा सूरत दिखलाती है

कुछ सोच मेरा मन कहीं खो जाता है

फिर कुछ सोच, मेरी आँखों में आँसू आ जाता है

क्या, अपनी  नन्ही पारी को बापू इतनी जल्दी विदा कर दोगे

इतनी जल्दी माँ , क्या मुझे पराई कर दोगी

 

अभी नहीं हुई श्यानी , कुछ साल और घर में रहने दो

अभी नादान हूँ , कुछ दिन और भाई से लड़ने दो

 

क्यों मेरी शादी की इतनी जल्दी है , क्यों बेचैन हुई हल्दी है ?

दुनिया के बुराइयों से अभी मुझे लड़ने दो

नादान हूँ , बापू अभी मुझे पढ़ने दो

 

माँ बाप का नाम रौशन करना अभी बाकि है

खुद की पहचान बनाने की , आग अभी बाकि है

उड़ने को पूरा, आशमान अभी बाकि है

मैं भी घर का चिराग बनना चाहती हूँ

अभी नहीं हुई श्यानी , कुछ साल और घर में रहने दो

अभी नादान हूँ , कुछ दिन और भाई से लड़ने दो

नादान हूँ , बापू अभी मुझे पढ़ने दो ॥

 

माँ, बापू से कर दो मेरी ये सिफारिस

माँ मेरे लिए कर दो एक और गुजारिश

अभी नादान हूँ , कुछ दिन और भाई से लड़ने दो

कह दो बापू से बेटी को अभी पढ़ने दें ॥

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Anurag Verma

Blogging since age of 14

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